मौर्य कला

परिचय
मौर्य काल को भारतीय कला के इतिहास का प्रारंभ मन जाता है। जहां चंद्रगुप्त मौर्य एवम अशोक आदि समरतो के प्रेरणा से राजकीय कला ने ऊंचा को छुआ है वही लोक कला के दृष्टिकोण से भी यह काल उन्नत रहा है। बिहार से अनेक राजकीय एवं लोक कला से संबंध मौर्यकालीन कला एवं स्थापत्य के नाम प्रपथ हुए हैं। मौर्यकालीन स्टापत्य के अवशेस पटना राजगीर तथा गया के समीप बराबर की पहाड़ियों में देखे जा सकते हैं।
मौर्य कला के प्रकार -
1. राजकीय या दरबारी कला
चंद्रगुप्त कालीन कला - राजकीय कला का सर्वोत्म मगध सम्राट चंद्रगुप्त का पाटलिपुत्र सीत कुम्हरार से प्रपत राजप्रसाद है। इस सभा भवन के अहसास से इश्की विशालता का अनुमान लगा जा सकता है।
अशोक कालीन कला - मौर्य कला के सार्वजनिक अवशेस अशोक से समय से प्राप्त हुए हैं। सम्राट अशोक के समय की कलाकृति को चार भागो में बनता जा सकता है।
स्तंभ - यह मौर्य कालीन कला के सर्वोत्तम उधरन है। स्तंभो की सांख्य निहित नहीं है। ये स्तंभ दो प्रकार के पाए जाते है।
स्तूप - ये स्टूप आईट ये प्रस्तर के बने ठोश गमबंद होते हैं।
पासन वेदिका - मौर्य कालीन स्टूप विहार वेदिकाओ से घिरे होते हैं।
गुहा विहार - सम्राट अशोक ने भिक्षुओं के रहने के लिए गुहाओं के रूप में विहार बनवाये थे।
2. लोक कला एवम मूर्तिकला - मौर्य कला में राजकीय दरबार से बहार जनसाधारण के द्वार कला का अधबुत विकास हुआ, जिसे लोक कला कहा गया है। मूर्ति कला के श्रेठ नाम इसी लोक कला के प्रमाण है।
मौर्य कला की विशिष्टता -
चमकदार पॉलिश, मूर्तियों की सजीव भाव अभिव्यक्ति, एकाश्म पत्थर द्वारा निर्मित पाषाण स्तंभ एवं उनके कलात्मक शिखर पत्थरों पर पॉलिश करने की कला, इस काल में इस स्तर पर पहुँच गई थी कि आज भी अशोक की लाट की पॉलिश शीशे की भाँति चमकती है।

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