बौद्ध धर्म में मुद्राये - ध्यान मुद्रा - इस मुद्रा को समाधि या योग मुद्रा भी कहा जाता है और यह अवस्था बुध शाक्यमुनि ध्यानी बुद्ध अमिताभ और चिकित्सा बुद्ध की विशेष की और इशारा करता है। इस मुद्रा में दोनो हाथ को भगवान में राखा जाता है, दिन हाथ को बाय हाथ के ऊपरी तरह से उंगली फैला कर रखता है। तथा अंगुठे को ऊपर की और रखा जाता है और नीचे हाथ को एक दूसरे के ऊपर टीका कर राखी जाती है।
अंजलि मुद्रा - यह बौद्ध धरम में प्रयोग की जाने वाली सबसे आम मुद्रा है। इसे नमस्कार मुद्रा या हृदयांजलि मुद्रा भी कहा जाता है, जो अभिवादन, प्रार्थना और आराधना के इशारे का प्रतिनिधिव करती है। हथेलिया ऊपर की और, अनग्लियां जुरी हुई और अंगूठे एक - दूसरे के आगरा भाग को चूटी हुई अवस्थ में होते हैं। वितर्क मुद्रा -इस मुद्रा को शिक्षण मुद्रा या चर्चा मुद्रा भी कहा जाता है और इसमें दहिने हाथ को ऊपर उठाने और अंगुठे एवम तर्जनी के मध्यम से वृत्त बनाना समिल है। यह ज्ञान के संचार और बुध की शिक्षा के संचार का प्रतीक है।
वरद मुद्रा - इस मुद्रा में दहिना हाथ नीचे की और फला होता है, जिस्मे हथेली बहार की और होती है। यह उदार करुणा को पूरा करने का प्रतीक है, अभय मुद्रा - इस मुद्रा में दहिने हाथ को कंधे की उचाई तक ऊपर थाना दामी। है जिस्मे तहली बहार की और होती है। यह निदर्त सुरक्षा और नकर्त्तमक को दूर करने का प्रतिक है।
भूमि स्पर्श मुद्रा - इस मुद्रा में दहिने हाथ की उंगलियो से जामिमको चुना सामिल है, जबकी बयान हाथ भगवान में रहता है, याह बुध के गनोदय के क्षण को प्रदशित करता है और जमीन को संकेत पृथ्वी उनके गनोदय की साक्षी की प्रतीक है, उत्तरबोधि मुद्रा - इस मुद्रा में दोनो हाथो को जोरकर हृदय के पास रखा जाता है और ट्रैजनी उन्गली एक दूसरे को चुत हुए ऊपर की और होती है तहता अन्य अंगली अंदर की और मुड़ी होती है जिसके त्रिभुज के आकार का निर्माण होता है यह मुद्रा ज्ञान और करुणा के संगम, पुरुषत्व एवम स्त्रितव ऊर्जा के संतुलन तथा रंगों के सभी पहलु के एकीकरण के माध्यम से ज्ञान प्रपात का प्रतिनिधिव करती है। धर्मचक्र मुद्रा - इसमें हाथो को हृदय के सामने रखता है, और प्रतीक हाथ के अंगूठे और तर्जनी एक वृत्त का निर्माण किया जाता है प्रतीक हाथ की शे तीन उन्गली ऊपर की और होती है जो बौद्ध धर्म के त्रि रतन का प्रतिनिधितव करती है। करण मुद्रा - इसमें बाया हाथ ऊपर लाया जाता है और हथेली आगे की और होती है। तर्जनी तथा छोटी सीधी ऊपर की और संकेत करती है जबकी अन्य तीन जंगली हथेलियों की और मूरी होती है। यह मुद्रा अक्सर बुध के चित्रन में देखी जाति है। ज्ञान मुद्रा- इसमें तर्जनी और अंगुठे को एक साथ लाका रेक वृत्त का निर्माण किया जाता है जबकी अन्य तीन उन्गली बहार की और राखी जाति है यह इसरा सरभौमिक चेतना के साथ वटीगत चेतना की एकता और बुध की शिक्षा के मध्य संबंध का प्रतिनिधिव कर्ता है।
तर्जनी मुद्रा - इसमें तर्जनी उन्गली को ऊपर की और बढिया जाती है जबकी
अन्य उंगली को हथेली की और मोरा जाता है तर्जनी मुद्रा, जिसे भाया के इसरे के रूप में भी जाना जाता है। इसका प्रयोग बुरी तकतो या हानिकारक प्रभाव के खिलाफ चेतावनी या सुरक्षा के प्रतीक के रूप में किया जाता है।

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